कलम ने ही तो साथ दिया है ~ मनीष कुमार "असमर्थ"
Quotes
"कलम ने ही तो साथ दिया है", -
थके हारे हुए, हताश होकर कई किलोमीटर चलने के बाद जैसे ही अपने कमरे में घुसा! घना अंधेरा, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। किताबें बिखरी हुईं थीं, ए -4 साइज के पेपर फैले हुए थे जैसे ही धोखे से कागजों में पांव पड़ता, खर्र सी आवाज़ आती , दिल से चित्कार हो उठता कि अरे यार मैने विद्या को पांव मार दी! जैसे तैसे संभलते हुए उन कागजों और किताबों के मेले में अपने दोस्त को ढूंढना शुरू किया। ऐसे लग रहा था जैसे भारी भरकम कुंभ के मेले में मेरा दोस्त कहीं खो गया हैं। व्याकुल क्यों न होऊं आखिर वही तो था जिसके वजह से मैं अंधेरे को हटाने वाला था। कभी किताबों की बंडले हटाता ,तो कभी ए-4 साइज के पेपर तो कभी समाचार पत्रों को हटाता और ढूंढ रहा था कि आखिर मेरा मित्र खो कहां गया है?? सुबह यहीं छोड़के तो गया था।
बहुत प्रयास करने के बाद थककर बिस्तर के एक पाया को पकड़कर हाथ पांव फैलाकर उसीपे टिक जाता हूं। और उसी को याद करते हुए फर्श पे ही सो जाता हूं नए नवेले सूरज की चमक जैसे ही मेरे आंखों में अचानक पड़ती हैं जंभाई लेते हुए नींद खुल जाता है और तब मैं देखता हूं धूल भरी हुई फर्श, उन कागजों के ऊपर भी धूल का गत्ता लगा हुआ था। तभी मेरी नजर स्टैंड पे पड़ती हैं तब मेरा दोस्त उन कागजों के मेले में स्टैंड पे अकेला ही खड़ा था जिसका मुझे कल से इंतजार था। घर से निकलने से पहले मुझे पता हो गया था कि अंधेरे में लौटकर आऊंगा। फिर भी उसे साथ लेकर नहीं गया नाराज़ था वो। आख़िर क्यों न हो दोस्त है मेरा। उसको ये बिल्कुल भी पसंद नहीं कि उसके रहते मुझे भटकना पड़े।
आप जानते हैं, मैं किस दोस्त की बात कर रहा हूं?? मै अपने दोस्त जो मेरा हाथ पकड़े रहता है मेरे पेन की बात कर रहा हूं, वही पेन स्टैंड पे रखा हुआ था और मैं रात को इसलिए ढूंढ रहा था क्योंकि उस पेन में एक तरफ लिखाई होती थी और दूसरी ओर टॉर्च था। टॉर्च से ही तो मुझे अंधेरा हटा के दुनियां देखनी थी।
अकस्मात उठकर मैंने पेन स्टेंड से पेन उठा ली और वहीं पे पड़ा ए-4 साइज के सादे लिबास पे स्याही चिपकाना शुरू किया........।
तो पेन पेपर पर अपनी स्याही निकालते हुए मुझसे कहने लग गया कि बड़े स्वार्थी हो यार!अब मेरी इतनी ही जरूरत रह गई है क्या?? अगर वो बेवफा निकली तो मुझे क्यों भूले जा रहे हो?? मेला में उसने छोड़ था तुमको, और मेले की कहानी मुझसे जोड़े जा रहे हो। हर रोज सुबह निकलते हो और रात के अंधेरे में घर आते हो और मुझे केवल इसीलिए ढूंढते हो ताकि मेरा टॉर्च तुम्हें उजियारा दिखाये। मैं केवल टॉर्च नहीं हूं तुम्हारी। मै सच कह रही हूं मैं तुम्हारी किस्मत हूं। मेरे सामने वाला भाग हमेशा के लिए अंधेरा मिटाने का काम करता है। एक बार सामने पड़ी कागज़ पे चलाकर तो देखो लकीर खींचने का काम करती हूं।
अब मेरा मन जाग रहा था और हृदय में उत्साह लेकर मैंने लकीर खींचना शुरु किया और सच में मुझे लग रहा था की मेरी लकीर बदल रही है। खुशी मिल रहा था मुझे।अब समझ आ गया था कि ये मुझे ही नहीं बल्कि ये दुनियां को उजाला देने का काम करती है शायद इसीलिए उसको मुझसे शिकायत रहता था कि उसके रहते मुझे भटकना क्यों पड़ रहा है?? और अब जब भी मेले में बिछड़े हुए दोस्त की याद आती है ऐसी ही कहानियां मेरा ये दोस्त लिखवाता रहता है। सचमुच मेरा सच्चा साथी मेरा पेन ही है।
अब मैंने गणित के किताबों को खोलकर फिर से पुराने सवाल हल करना शुरू कर दिया है और जिंदगी के अनसुलझे सवालों के जवाब अपने आप ही मुझे मिलते चले जा रहे हैं।
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