ये इश्क का शहर नहीं....~ मनीष कुमार "असमर्थ"

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ये इश्क का शहर नहीं.....

ये इश्क का शहर नही है...
ये तो नफरतों की ऊंची इमारतें..!
घृणाओं की चौड़ी सड़कें...
चिड़ चिड़ापन लिए हुए ये ट्रैफिक....
हिंसक चौक, आंखे तरेरती भीड़,
तनाव में भरे पार्क, खिसियाई बाज़ार...
चिक चिक करती वाहनों की आवाज़
गालियां देती नालियों की बास
और गुस्सैल बस्तियों से विकसित है।
अगर यहां तुमने प्रेम करने का साहस किया..! 
तो पन्नियों में बोटी बोटी काटकर 
गांव भेज दिए जाओगे...!
जहां तुम्हारा गांव..
बरगद के पेड़ के नीचे,
चारपाई बिछाकर प्रतीक्षा रत होगी।
जहां तुम्हारी मां ,
सड़क के किनारे,  
माथे पर एक हाथ रखे हुए, 
तुम्हारे टुकड़ों का इंतज़ार कर रही होगी...!
तुम्हारे खेत - खलिहान
तुम्हारे कटे हिस्सों के पसीने के प्यासे होंगे..!
वो नदियां, वो झरने..
तुम्हारे रक्तरंजित गोश को 
नहलाने के लिए, व्याकुल हो रहे होंगे...
आम के पेड़ों की डालियां

 तुम्हारे अव्यवस्थित अंगो को झूलाने के लिए
उत्साहित हो रहे होंगे..!
शहर से गर इश्क लेकर गांव गए ,तो टुकड़ों में जाओगे!
क्योंकि तुम गांव के धूल भरे गलियों के इश्कबाज हो...
 और ये शहर के रास्ते तो, सांप्रदायिक नफ़रत से बंटे हुए है.....! 
                                             ~"असमर्थ"

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