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स्त्रियां प्रेम में बहती गईं

 अनूठे मोती हार, सिलवटदार साड़ी पहने छोटे साम्राज्य की मालिकिन  प्रेम पुट में डूबी  लचकदार लहराती...! रमणी। विशाल साम्राज्य वाले,  झूठे प्रेमी, खारे सनकी, राजा की ओर  प्रवाहमान होती हैं। स्त्रियां प्रेम में बहती गईं  और दुष्ट खारे, तूफ़ानी, बहुनद छलावा करते गए। ~ असमर्थ

आज़ रहने दो कल करते हैं।

आज़ रहने दो कल करते हैं। वो जो सवाल थे अब करते हैं। जंगली फूल को नुमाईश की जरुरत थी। न जाने झाड़ी पर्दा क्यों करते हैं? इम्तिहान में मैंने सारे जवाब गलत किए। फिर उनकी नजरें मेरी नकल क्यों करते हैं? वो चाहते हैं कि मैं मर जाऊं एक दिन। जैसे ही मर जाता हूं,वो जिंदा क्यों करते हैं? उनके आंचल में खुद को दफ्न कर लिया मैने। उनकी पाज़ेब मेरी कब्र तैयार ही क्यों करते हैं.? ~असमर्थ 

कौन है जो कातिल बना फिर रहा है शहर में?

कौन है जो कातिल बना फिर रहा है शहर में? कौन है जो खंजर लिए,फिर रहा है शहर मे.? कौन है जो इस शहर को खौफ से भर दिया? कौन है जो हसीन बने,फिर रहा है शहर में? किसने शहर में ख़ून खराबा कर रखा है? कौन है जो लाल दुपट्टा लिए फिर रहा है शहर में? सारे लड़के काले धुएं से मरते जा रहे हैं। कौन है जो आग लगाता, फिर रहा है शहर में? बिना कोई जुर्म, बिना कोई मुजरिम,बिना कोई कायदा। कौन है जो सज़ा बांटते फिर रहा है शहर में.? ~असमर्थ 

धुआं देख।

पतझड़ न देख, जंगल की धुआं देख। बारिश न देख, झोपड़ी की धुंआ देख। सर्दी न देख, नदी की धुआं देख। खेत न देख, सड़क की धुंआ देख। आंख न देख, अंदर की धुंआ देख। दंगे न देख, संसद की धुआं देख। तारे न देख, आसमां की धुआं देख। रोटी न देख, अम्मा की धुआं देख। ~ असमर्थ

इश्क एक खीझ ...!

मैं मांसाहारी हूं.. न? बार बार कहती थी। मेरा दिमाग़ मत खाओ! दिमाग मत चाटो! मेरा मांस मत नोचो! मुझे मत पकाओ! मेरा भेजा फ्राई कर दिए! मेरा कान खा लेते हो तुम! मैं जानता हूं कभी तुम्हे प्रेम ही नहीं था मुझसे..!  फिर भी हड्डी चूसता था! हड्डी चबाता था! चुल्लूओं लहू पीता था! तलवे चाटता था। बाहें निचोड़ता था। तुम सच कहती थी। मैं असमर्थ हूं..! तुम्हारे योग्य ही नहीं हूं!  इसलिए अब खुद की किस्मत पे! दांतो तले उंगली दबाता हूं। खुद का होंठ चबाता हूं! दांत पीस कर रह जाता हूं! याद में मूंह की खा जाता हूं। अब तो मुझे... खून का घूंट पीकर रहना पड़ता है। कोई स्वाद मेरा अंग ही नहीं लगता। तुम्हारा जान खाने से ही मेरा पेट भरता है।                                     ~ मनीष कुमार "असमर्थ"

क्या करते जहर को साथ में रखना ही था।

क्या करते जहर को साथ में रखना ही था। पीते या न पीते, हमें तो मरना ही था। अक्स ने उस गली में छोड़ दिया, रूह ने इस गली में। कोई चले या न चले, लगा उसे तो साथ चलना ही था। पौधा लगाकर आसमां से धुआं हटादी मैने। उन्हीं सांसों को कत्ल मेरा, एक दिन करना ही था। फटा जेब जेब में बटुआ, बटुए में थी दुनियां मेरी सफर में मैं साथ में जेबकतरा, आज उसे बिछड़ना ही था।। सुरज उसके तरफ थे , चांद सितारे भी थे उसी के तरफ़ । फिर तो सारी दुनियां को, एक दिन बिखरना ही था। ~ असमर्थ 

लहराते चुन्नी को बहने दे अपनी।

लहराते चुन्नी को बहने दे अपनी।  खुलें बालों को ऐसे रहने दे अपनी ।। आंख बंद करके यूं ही मुस्कुराते रह,  दुनियां वालों को कह लेने दे अपनी ।। गोरे ठुड्डी को मुठ्ठी से टिकाए रख आज ।  तिरछे नज़रों को मिल लेने दे अपनी।। गजरे को कलाई में ऐसे ही चढ़ाये रख।  कंगन को इज़हार-ए-इश्क़ कर लेने दे अपनी।। काजल वाली चिड़िया रोज़ दिखा कर छत से ।  मुझे भी सूखी आंख, सेंक लेने दे अपनी। असमर्थ

एकांत गांव

 शांत रात, एकांत रात, जंगल के मध्य, गांव के भूतैल पुराने घर, फर्श पे आह्टें, गलियों में सन्नाटे, कुत्तों की भौं भौं, दरवाज़े की चुरचुराहटें, परदे का फट फट,  हवाओं की फुसफुसाहटें, टिड्डों की कट कटाहटें, बरखा की टिप टिप, डरावने परछाईं, सनसनाती काली रात के बीच, अचानक स्त्री चिल्लाई। कुर्सी पे बैठा हृदय काँऽऽऽप गया..! डरे हुए आंख सो गए। सुबह कानों में आवाज़ें गूंजने लगी। कल रात किसी स्त्री की बेरहमी से हत्या कर दी गई है। ~असमर्थ